संपादक की कलम से: न्यायपालिका की साख पर सवाल

Sandesh Wahak Digital Desk: दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के आवास से जले नोटों के ढेर मिलने के बाद न्यायपालिका की साख पर सवाल उठने लगे हैं। हंगामे के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ न केवल तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की है बल्कि उन्हें न्यायिक कार्य करने से रोक दिया है।

सवाल यह है कि :

  • आखिर इतने नोट जस्टिस वर्मा के आवास पर आए कहां से?
  • क्या नोटों के जरिए न्यायाधीश ने पक्षपातपूर्ण फैसले दिए?
  • क्या इसके कारण न्याय की गरिमा को ठेस नहीं लगी है?
  • क्या न्यायिक कार्य के दौरान जस्टिस वर्मा के फैसलों की समीक्षा होगी?
  • क्या सुप्रीम कोर्ट न्यायिक शुचिता बनाने के लिए ठोस रणनीति बनाएगा?
  • क्या अदालतों में फैले भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की जरूरत न्यायपालिका को समझ आ रही है?
  • क्या जस्टिस वर्मा का मामला सिर्फ जांच तक सीमित रहेगा या अपने अंजाम तक भी पहुंचेगा?
  • क्या कानून मंत्रालय, सरकार और संसद कोई ठोस पहल करेगी?

जस्टिस वर्मा के मामले ने न्यायिक प्रणाली और इसके पीछे के खेल को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। हालांकि यह निष्पक्ष जांच के बाद ही पता चलेगा कि ये पैसा कहां से और किस आधार पर लिया गया था। इसमें दो राय नहीं कि इतना पैसा कतई ईमानदारी का नहीं है क्योंकि कोई भी व्यक्ति उसे घर में नहीं रखता है। जस्टिस वर्मा का मामला पहला नहीं है। इसके पहले 2009 में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के जज जस्टिस निर्मल यादव पर 15 लाख की घूस लेने का आरोप लगा था।

नोटों के अंबार ने एक बार फिर न्यायपालिका पर सवालिया निशान लगा दिए

वहीं मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पी.डी. दिनाकरण पर तमिलनाडु में अवैध जमीन अर्जन और संपत्ति संचय के आरोप लगे। उनके खिलाफ 16 शिकायतें दर्ज की गईं, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उनकी पदोन्नति रोक दी थी। जांच के दबाव में दिनाकरण ने 2011 में इस्तीफा दे दिया था। कई जजों पर ऐसे आरोप सुर्खियां बन चुकी हैं। जस्टिस वर्मा के घर से मिले नोटों के अंबार ने एक बार फिर न्यायपालिका पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। वैसे अदालतों में भ्रष्टाचार के मामले कोई नयी बात नहीं है लेकिन न्यायाधीशों पर इस प्रकार के आरोप बेहद गंभीर हैं।

इससे आम आदमी पर न्याय के प्रति बने विश्वास को चोट लगी है। यह निष्पक्ष न्याय के सिद्धांत को कठघरे में खड़ा कर रही है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और इसकी जांच पड़ताल शुरू  कर दी है। अब जांच के बाद ही सही तथ्यों का पता चलेगा लेकिन इस कैश कांड ने पूरे देश में हलचल मचा दी है। न्यायपालिका की साख को बचाने के लिए खुद सुप्रीम कोर्ट को आगे आना होगा और ईमानदारी के मानक तय करने होंगे। एक ऐसी पारदर्शी व्यवस्था बनानी होगी ताकि किसी न्यायाधीश की निष्पक्षता और उसके फैसलों पर सवाल न उठे। इसके अलावा सरकार और संसद को भी इस मामले को गंभीरता से लेने की जरूरत है अन्यथा लोकतंत्र में न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठते रहेंगे, यह देश के लिए ठीक नहीं होगा।

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