महाघोटाला पार्ट 2: अंसल के कदमों में बिछ गये अफसर, सौंप दी बरौना गांव की भूमि

Sandesh Wahak Digital Desk/Manish Srivastava: राजनेताओं और नौकरशाही के भ्रष्ट कॉकटेल ने अंसल एपीआई की सुशांत गोल्फ सिटी को महाघोटाला बना दिया। दागी बिल्डर के ऊपर खूब मेहरबानियां दिखाई गयीं।
यूपी आवास विकास परिषद (हाउसिंग बोर्ड) की अवध विहार योजना के सेक्टर सात-बी में स्थित बरौना ग्राम की जिस करोड़ों की जमीन को अंसल एपीआई ने फर्जी तरीके से कब्जे में करके निवेशकों को हवा में आवंटित कर ठगा था। उस घोटाले पर एफआईआर कराने की बजाय अफसरों ने सुनियोजित तरीके से पूरी जमीन अंसल को समझौते के जरिये देने की पटकथा लिख डाली। अंसल ने बरौना के भूमि संबंधी विवाद के निस्तारण के लिए जो दो समाधान सुझाये थे, उनमे से एक पर सहमति दिखाई गयी।

इस षड्यंत्र में शासन से लेकर आवास विकास परिषद के तमाम अफसर शामिल थे। बरौना के बदले तय हुआ करोड़ों का जुर्माना भी आज़तक नहीं वसूला गया है। लखनऊ हाईकोर्ट ने 2013 में यूपी सरकार को अंसल और परिषद के बीच बरौना भूमि विवाद को दो माह में निपटाने के आदेश दिए थे। बिल्डर की पहली याचिका के जवाब में बरौना गांव की जमीन देने संबंधी अंसल का आवेदन पूर्व में जांच के बाद शासन स्तर पर ही ख़ारिज हो चुका था। अंसल ने बाद में पुन: हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इसी की आड़ में आवास विकास परिषद का हित अंसल के आगे गिरवी रख दिया गया।
अंसल के कदमों में बिछ गये अफसर, सौंप दी बरौना गांव की भूमि
निस्तारण के नाम पर अफसरों को खरीदकर बरौना ग्राम की भूमि आखिरकार अपने पाले में कराने में अंसल कामयाब रहा। 16 दिसंबर 2013 को तत्कालीन प्रमुख सचिव आवास सदाकांत शुक्ला ने अंसल के प्रत्यावेदन को निस्तारित करने संबंधी जो आदेश जारी किया। उसमें साफ है कि जनहित के नाम पर अंसल की जालसाजी का मौन नियमितीकरण कर दिया गया। शासन ने बिना आपत्ति गेंद परिषद के पाले में जैसे ही डाली, वहां बैठे अफसरों ने तत्काल अंसल के लिए पालक पांवड़े बिछा दिए।

अंसल के आवेदन पर शासन में सचिव आवास रहे राजीव अग्रवाल ने रिपोर्ट तैयार की थी। सचिव ने तत्कालीन आवास आयुक्त एमकेएस सुंदरम, एलडीए के अधिशासी अभियंता ओपी मिश्रा, अपर आवास आयुक्त आरपी सिंह, वित्त नियंत्रक आवास विकास रंजन मिश्र के साथ ताबड़तोड़ कई बैठकें इस संबंध में की थी। तत्समय राजीव अग्रवाल के पास सचिव आवास और वीसी एलडीए दोनों का चार्ज था।
प्रमुख सचिव आवास के आदेश में जिक्र था कि एलडीए के पत्र दिनांक 25 मई 2006 के तहत अंसल की टाउनशिप से संबंधित दो मानचित्र परिषद मुख्यालय को प्राप्त हुए। जिसमें बरौना ग्राम सम्मिलित नहीं होने वाले 1765 एकड़ से संबंधित नक्शे को सैद्धांतिक मंजूरी मिली थी। वहीं अंसल ने अपने प्रत्यावेदन में कहा कि शासन ने एलडीए से आख्या मांगी थी। तथ्यात्मक आख्या प्रस्तुत की गयी। लेकिन पूर्व में शासन द्वारा पारित आदेश से प्रारम्भ की स्थिति के टेंडर सहित प्रस्तुत स्कीमेटिक प्लान को त्रुटिवश डीपीआर का लेआउट समझा गया। अंसल की हाईटेक टाउनशिप से पहले ही बरौना की जमीन परिषद अधिग्रहीत कर चुका था। परिषद ने बरौना ग्राम समेत पूरी भूमि का गजट प्रकाशन 7 अक्टूबर 2006 को किया था।
अंसल को दी बेशकीमती जमीन
वहीं अंसल एपीआई ने एलडीए में बरौना ग्राम की भूमि हड़पकर आस्था अपार्टमेंट के नाम पर अल्प आय वर्ग के भवनों का नक्शा स्वीकृति के लिए 27 जनवरी 2009 को प्रस्तुत किया था। इस लिहाज से अंसल द्वारा किया आवंटन/ निर्माण की कार्यवाही पूरी तरह अवैध है। डेवलपर्स कम्पनी द्वारा उक्त भूमि का क्रय विक्रय योजना के नोटिफिकेशन/अधिग्रहण के बाद किया गया है। जो अवैध खरीद फरोख्त कहलाता है। ऐसा खुद शासन ने कबूला। खतौनी में भी परिषद के नाम का उल्लेख है। जब बरौना ग्राम की बेशकीमती जमीन अंसल को दी गयी। तब तक परिषद यहां 14 करोड़ से ज्यादा विकास कार्यों पर खर्च करके अपनी अवध विहार योजना के लिए पंजीकरण खोलने जा रहा था। अंसल ने परिषद की बनाई सडक़ और नाले को भी क्षतिग्रस्त कर दिया था। प्रमुख सचिव के आदेश में कहा गया है कि सचिव आवास की अध्यक्षता में बनाई समिति ने अंसल को अपना पक्ष रखने की अनुमति दी थी।
परिषद के अफसरों ने शासन की सहमति के लिए तैयार किया प्रस्ताव
अंसल द्वारा दिए गए दूसरे समाधान बिंदु पर शासन सहमत दिखा। जिसके मुताबिक अंसल एपीआई द्वारा इस भूमि का आवंटन कर दिया गया है। जिससे थर्ड पार्टी इंटरेस्ट सृजित हो गया है। इसलिए भूमि अधिग्रहण के लिए देय मुआवजे की धनराशि और सम्पूर्ण खर्चे अंसल द्वारा वहन किये जाएं। वहीं 500 रूपए प्रति वर्गमीटर की दर से विकास शुल्क परिषद को दिया जाए। साथ में अंसल के स्वामित्व में परिषद की आवासीय योजनान्तर्गत 34 एकड़ भूमि है। जिसे वह नियमानुसार परिषद को देय मुआवजे पर देने को तैयार है। शासन भी इसी फॉर्मूले पर सहमत हुआ। फिर गेंद आवास विकास परिषद् को स्वायत्तशासी संस्था बताते हुए अंसल द्वारा देय धनराशि के निर्धारण के लिए उसके पाले में डाल दी गई। इसके बाद परिषद के अफसरों ने शासन की सहमति के लिए प्रस्ताव तैयार किया।
नौ सितंबर 2015 को शासन में तत्कालीन सचिव आवास पंधारी यादव ने आवास आयुक्त को पत्र भेजकर अंसल की टाउनशिप के बीच आ रही ग्राम बरौना की खसरा संख्या एक से 116 की करीब 74.876 एकड़ भूमि के विवाद के लिए परिषद द्वारा उपलब्ध कराये प्रस्ताव को झट हरी झंडी दे दी थी। जिसके चलते उक्त भूमि परिषद की योजना से अलग हो जायेगी। 21 जुलाई 2015 को प्रमुख सचिव आवास को भेजे प्रस्ताव में परिषद के तत्कालीन सचिव आरपी सिंह ने कहा था कि परिषद के बोर्ड ने 18 जून 2014 को कुछ शर्तों के साथ अंसल को जमीन देने पर सहमति जताई। इसमें परिषद द्वारा 12 करोड़ तीन हजार रूपए विकास कार्यों पर खर्च किये जाने का जिक्र है। 18 मई 2016 को अंसल से 46 करोड़ 57 लाख 57 हजार 940 रूपए जमीन छोडऩे के बदले तय हुआ। साथ ही अंसल की 51 करोड़ 10 लाख 92 हजार मूल्य की भूमि परिषद के पास बंधक रखी जायेगी।
सड़क की चौड़ाई कम करके पहुंचाया करोड़ों का लाभ
एलडीए-परिषद की आख्या के मुताबिक परिषद की 29 मई 2006 को हुई 193वीं बैठक में टाउनशिप विकसित करने के लिए अंसल एपीआई के पक्ष में धारा 28 के प्रस्ताव में शामिल भूमि में से 1765 एकड़ परिषद से छोड़े जाने का इस प्रतिबंध के साथ अनुमोदन दिया गया था कि सुल्तानपुर रोड से शहीद पथ के समानांतर उतरेठिया रेलवे लाइन तक न्यूनतम 100 मीटर चौड़ा मार्ग विकासकर्ता कम्पनी अपने खर्चे पर बनाएगी। 1765 एकड़ में बरौना गांव की भूमि सम्मिलित नहीं थी। इसके बावजूद अंसल ने 45 मीटर सडक़ बनाई। जिससे बिल्डर को करोड़ों का लाभ मिला। अफसरों ने टिप्पणी में कहा कि अंसल 45 मीटर सडक़ व रेलमार्ग पर आरओबी का निर्माण अपने खर्चे पर कर रहा है।
शासन में बैठे आवास विभाग के अफसरों का दोहरा मापदंड
इस गंभीर मामले पर शासन के अफसरों का दोहरा मापदंड नजर आया। सचिव आवास ने अंसल के प्रत्यावेदन को 13 अक्टूबर 2011 को शासनादेश जारी करके निरस्त किया था। वहीं बाद में 2013 में तत्कालीन सचिव आवास राजीव अग्रवाल ने अंसल एपीआई के दूसरे प्रत्यावेदन पर सौंपी रिपोर्ट में सकारात्मक टिप्पणी करते हुए गेंद आवास विकास के पाले में डाली। जिससे अंसल और परिषद में बैठे उसके मददगार अफसरों की राह आसान हुई।
आखिर एलडीए से कहां गायब हुई डीपीआर?
तत्कालीन प्रमुख सचिव आवास सदाकांत ने साफ लिखा कि एलडीए द्वारा बताया गया कि दिनांक 22 मई 2006 को आवास विकास परिषद को प्राधिकरण द्वारा भेजी गयी डीपीआर की प्रति उसके पास उपलब्ध ही नहीं है। सवाल साफ है कि आखिर एलडीए से डीपीआर कहां गायब हो गयी। वहीं परिषद की तरफ से बताया गया कि 1765 एकड़ क्षेत्रफल से संबंधित मानचित्र पर डीपीआर कमेटी की बैठक में सैद्धांतिक मंजूरी दी गयी है। लेकिन एलडीए बोर्ड द्वारा डीपीआर मानचित्र के अनुमोदन का कोई अभिलेख परिषद में मौजूद नहीं है।
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